डिग्री मामले में वकील ने किया सरकारी दस्तावेज़ों में हेरफेर?

सुप्रीम कोर्ट ने दर्ज किया कि सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को एक वकील द्वारा पेश की गई बी.काम डिग्री के मामले में जालसाज़ी और सरकारी दस्तावेज़ों में हेराफेरी जैसे गंभीर अपराधों के शुरुआती सबूत मिले हैं।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने 17 अगस्त, 2026 को पारित आदेश में दर्ज किया कि सीबीआई ने कोर्ट के 15 सितंबर, 2025 के निर्देश के बाद स्टेटस रिपोर्ट सौंपी थी। यह निर्देश नरेश दिलावरी द्वारा इस्तेमाल की गई डिग्री के असली या नकली होने की जांच के लिए दिया गया।

कोर्ट ने गौर किया कि सीबीआई की रिपोर्ट, जिसे सीलबंद लिफ़ाफ़े में सौंपा गया और कोर्ट में खोला गया, में कहा गया: “पहली नज़र में अपीलकर्ता (जो खुद अपना केस लड़ रहे हैं) और अन्य अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ़ जालसाज़ी, सरकारी दस्तावेज़ों में हेराफेरी आदि जैसे गंभीर अपराध किए जाने का मामला बनता है।”

यह कार्यवाही दिलावरी की शैक्षणिक योग्यताओं की असलियत को लेकर उनके खिलाफ़ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़ी है। दिलावरी 2001 से वकील हैं और उन्होंने पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल से प्रैक्टिस करने का लाइसेंस हासिल किया।

यह मामला पहले सुप्रीम कोर्ट तब पहुंचा था, जब पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल ने उनके खिलाफ़ शिकायत के आधार पर 20 दिसंबर, 2021 के आदेश से दिलावरी के प्रैक्टिस करने के अधिकार को दो साल के लिए सस्पेंड कर दिया। दिलावरी ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (बीसीआई) की अनुशासनात्मक समिति के सामने इस सस्पेंशन को चुनौती दी।

16 जनवरी, 2025 को बीसीआई की अनुशासनात्मक समिति ने पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वे जांच करके उनकी शैक्षणिक योग्यताओं की असलियत का पता लगाएं। जांच पूरी होने तक उनके लाइसेंस को सस्पेंड रखने का निर्देश दिया गया।

इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दिलावरी की बी.काम डिग्री की असलियत पर सवाल उठे थे। कोर्ट ने मगध यूनिवर्सिटी, बोधगया के परीक्षा नियंत्रक द्वारा जारी एक सूचना पर ध्यान दिया, जिसमें कहा गया कि 1991 की परीक्षा के लिए दिलावरी के नाम पर जारी मार्कशीट और बी.कॉम  डिग्री “नकली थीं और यूनिवर्सिटी द्वारा जारी नहीं की गईं।” इसके बाद कोर्ट ने दिलावरी को उन डिग्रियों की फोटोकॉपी पेश करने का निर्देश दिया, जिनके आधार पर उन्होंने कॉमर्स और लॉ में ग्रेजुएट होने का दावा किया।

निर्देश के बाद दिलावरी ने 1991 की परीक्षा के लिए अपनी बी.काम (ऑनर्स) डिग्री सर्टिफिकेट की फोटोकॉपी पेश की। हालांकि, प्रतिवादी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट का ध्यान एक और दस्तावेज़ (एनेक्शर) की ओर दिलाया, जिसमें यूनिवर्सिटी के इस रुख को दोहराया गया कि दस्तावेज़ जाली हैं।

दिलावरी ने इस अंतर को यह कहकर समझाने की कोशिश की कि यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड फट गए या गायब हो गए, जिसके कारण उनकी नज़र में डिग्री की असलियत की पुष्टि करने में मुश्किलें आ सकती हैं।

कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को मामले को सुलझाने के लिए पर्याप्त नहीं माना और 15 सितंबर, 2025 को सीबीआईI को मामले की जांच करने का निर्देश दिया।कोर्ट ने कहा था: “चूंकि डिग्री की असलियत को लेकर सवाल उठा है, इसलिए हम केंद्रीय जांच ब्यूरो, दिल्ली से जांच करवाना और यह पता लगाना उचित समझते हैं कि क्या याचिकाकर्ता द्वारा मगध यूनिवर्सिटी से 1991 में बी.काम परीक्षा पास करने के आधार पर पेश की गई डिग्री असली है या जाली।”

17 अगस्त के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल अधिकारियों के सामने बाद में हुई अनुशासनात्मक कार्यवाही पर भी ध्यान दिया। पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल ने कोर्ट के सामने 5 अगस्त, 2025 का एक नोटिफिकेशन पेश किया, जिसमें बताया गया कि बीसीआई की अनुशासनात्मक समिति के निर्देशों के अनुसार जांच की गई।

इसके बाद 6 जुलाई, 2025 को बीसीआई की अनुशासनात्मक समिति द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, दिलावरी का नाम पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल के रोल से हटा दिया गया और उन्हें अपना लाइसेंस और संबंधित दस्तावेज़ सरेंडर करने का निर्देश भी दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने खुद पेश होकर दिलावरी ने बीसीआई की अनुशासनात्मक समिति के उस अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी, जिसके तहत उसने पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल को नई जांच करने और उसके बाद उनका नाम रोल से हटाने का निर्देश दिया।

उन्होंने तर्क दिया कि बीसीआई की अनुशासनात्मक समिति ने ऐसे निर्देश जारी करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा कार्यवाही में उस चुनौती के गुण-दोष की जांच नहीं की। बेंच ने कहा कि दिलावरी 5 अगस्त, 2025 के नोटिफिकेशन की कानूनी वैधता को सही फोरम के सामने सही कानूनी प्रक्रिया के ज़रिए चुनौती दे सकते हैं।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगर कोर्ट के आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर ऐसी कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाती है तो समय-सीमा (लिमिटेशन) का मुद्दा चुनौती पर विचार करने में बाधा नहीं बनेगा।

(जनचौक ब्यूरो)

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